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विश्व प्रसिद्ध मेला रोशनी ने बढ़ाई शहर की रौनक

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जगराओं:-(दिनेश) : पंजाब की धरती को पीरों, फकीरों, पैगंबरों, ऋषि, मुनियों, योद्धे, सूरमे तथा गुरुओं की धरती होने का यश हासिल है। प्रदेश भर में पीर-पैगंबरों के स्थानों पर होने वाले ये मेले विशेष महत्व रखते हैं। आरी-आरी-आरी विच जगरावां दे लगदी रोशनी भारी….। ये पंक्तियां पढ़ते ही हमारे मन में जगराओं के प्रसिद्ध मेले ‘जगराओं की रोशनी’ का जिक्र जहन में आ जाता है। यह मेला पंजाब में होने वाले मेलों में अपना विशेष स्थान रखता है। यह 24 फरवरी से शुरू हो रहा है और तीन दिन तक चलेगा। इस मेले में देश भर से प्रसिद्ध कव्वाल सूफियाना कलाम पेश कर समां बांधते हैं। यह महफिल रात भर चलती है। इसके अलावा पंजाब के कलाकार लोक गीत भी पेश करते हैं।अब डिस्पोजल रोड पर लगाए जा रहे रोशनी मेले में प्रदेश भर के अलावा देश-विदेश से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। मेले पर लोग देश-विदेश से प्रत्येक वर्ष 13 फाल्गुन को यहां चौकी भरते हैं। शारीरिक रोगों से मुक्ति पाने के लिए अरदास करते हैं। वे सबसे पहले कमल चौक के पास स्थित पीर बाबा मोहकमदीन की दरगाह पर माथा टेकते हैं और फिर अड्डा रायकोट में स्थित माइजीना की दरगाह पर नतमस्तक होकर मन्नतें मांगते हैं। मेले में सर्कस, झूले और बहुत सारे मनोरंजन के साधन होते हैं।मेला रोशनी व पीर बाबा मोहकमदीन के जीवन पर लेखक मनजीत कुमार ने मेला रोशनी पर सिलसिला नकशबंदीयां, सूफीयत व सिलसिला नकशबंदीयां और हजरत पीर मोहकमदीन जगरावां शरीफ तीन पुस्तकें लिखी हैं।

1. इतिहास : बादशाह जहांगीर ने मांगी मन्नत, पुत्र हुआ तो पूरा जगराओं रोशन किया था
जगराओं में मेला रोशनी के इतिहास पर नजर दौड़ाई जाए तो यह कहा जाता है कि बादशाह जहांगीर के घर कोई संतान नहीं थी। उसने यहां पीर बाबा मोहकमदीन की दरगाह पर पहुंच कर मन्नत मांगी। उसके घर पुत्र ने जन्म लिया। इस खुशी में उसने पीर बाबा मोहकमदीन की दरगाह पर और पूरे जगराओं शहर में दीये जला कर रोशन कर दिया। तब से यह मेला रोशनी शुरू हुआ और आज तक मनाया जा रहा है

2 पीर मोहकमदीन वली अल्ला के साथ जुड़ा हुआ है मेला
रोशनी मेला मुसलमान फकीर पीर बाबा मोहकमदीन वली
अल्ला के साथ जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि बाबा मोहकमदीन नैणी शहर, मनकाणा मोहल्ला, तहसील लोहियां जिला वलटोहा के रहने वाले थे। रब्बी इशक उन्हें सरहद ले आया और वह हजरत ख्वाजा अवाम साहिब (अमीन सरहंदी) के मुरीद बन गए। हजरत ख्वाजा के उपदेश से मोहकमदीन ने रत्ती खेड़ा (फरीदकोट) में 12 वर्ष तक तपस्या कर मौन धारण किया। उसके पश्चात पीर मोहकमदीन ने जगराओं के अगवाड गुज्जरां में डेरा लगा लिया। उसी स्थान पर पीर मोहकमदीन की दरगाह पर यह मेला लगता है।


3 . कम होता जा रहा है मेले का आकर्षण
अब इस रोशनी मेले का आकर्षण पहले की तरह नहीं रहा। लोगों का ऐसे मेलों के प्रति रुझान कम हो रहा है। वहीं स्थानीय प्रबंधक ढांचा और सरकार भी इसके लिए बराबर की जिम्मेदार है। जगराओं के बुजुर्ग आज भी बूटा मुहम्मद तथा नगीने जैसे गाने वालों को याद करते हैं। इन बजुर्गो के मन में मेला रोशनी की यादें अभी भी घर किए हुए हैं। उनका कहना है कि आज समय की मांग है कि ऐसे मेलों की संभाल रखें और शान बढ़ाएं। पहले खानगा चौक के पास सब्जी मंडी रोड पर लगता था लेकिन अब जगह न होने के कारण फिर डिस्पोजल रोड पर लगने लगा मेला, उचित जगह न होने के कारण मेला धीरे धीरे खत्म होता गया लोगो की मांग है कि इस मेले को बनाए रखने के लिये सरकार कोई ठोस कदम उठाएं


4 . शहर की विरासत को बचाने के लिए शासन को उठाने चाहिए पुख्ता कदम
सदियों से पुरानी सब्जी मंडी जगराओं के नजदीक खानगां चौक में लगते इस मेले के लिए अब स्थान नहीं रहा। वही पुरानी सब्जी मंडी वाला क्षेत्र अब रिहायशी और कामर्शियल हो चुका है और वहां पर बडे बडे घर व दुकानें बन गई हैं। अब यह कुछ समय से डिस्पोजल रोड पर लगना शुरू हो गया है। प्रशासन को चाहिए कि इस तरह की एतिहासिक धरोहर को याद रखने के लिए उचित और बड़ा स्थान उपलब्ध करवाया जाए ताकि जो मेला सदियों से पंजाब के मेलों की शान कहलाता था, उसकी रोशनी और चमक बरकरार रह सके।

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