Is Ram Rahim's coming out of jail a coincidence

राम रहीम का जेल से बाहर आना संयोग है या किसी राजनितिक पार्टी का दांव ?

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पंजाब ( पंजाब 365 न्यूज़ ) : पिछले कल जैसे ही खबर मिली की राम रहीम को आज बेल मिल जाएगी तभी से सियासत गरमा गयी। हर कोई इसके फायदे और नुक्सान गिनाने लगे लेकिन एक तरफ यह चुनावी माहौल गरमा गया तो दूसरी तरफ डेरा प्रमुख के लोगो में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। वहीं दोनों मामलों में पीड़ित खुलकर विरोध में आ गए हैं।आपको बता दे की डेरा सच्चा सौदा प्रमुख को 25 अगस्त 2017 को साध्वी यौन शोषण मामले में 20 साल की सजा हुई थी। तब से लेकर अब तक डेरा प्रमुख जेल में ही बंद है। इसके बाद पत्रकार छत्रपति हत्यकांड और रणजीत हत्याकांड में भी उसे सजा हो चुकी है। राम रहीम को सजा होने से पहले 4 फरवरी 2017 को पंजाब विधानसभा चुनाव हुए थे और तब कांग्रेस सत्ता में आई थी। मृतक पत्रकार के बेटे अंशुल छत्रपति ने कहा कि वे गुरमीत की फरलो को कोर्ट में चुनौती देंगे। वहीं सीएम मनोहर लाल ने कहा कि ये कानूनी प्रक्रिया है और कुछ चीजें हमारे सिस्टम, हमारे कानून और संविधान के हिसाब से चलती हैं।

खड़ा हुआ राजनितिक विवाद :
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को दी गई 21 दिन की फरलो से पंजाब में नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। पंजाब में मतदान से ठीक दो हफ्ते पहले उन्हें फरलो दिया जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि डेरा सच्चा सौदा का मालवा की 69 से ज्यादा सीटों पर सीधा प्रभाव है। वहीं डेरा मुखी को फरलो देने पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने कहा है कि यह फैसला पंजाब की भाईचारक सांझ को नुकसान पहुंचाने वाला है।
राम रहीम 27 फरवरी तक बाहर रहेगा। इसका सबसे ज्यादा असर यूपी और पंजाब के चुनाव पर होगा। पंजाब में 20 फरवरी को विधानसभा चुनाव है और सूबे के मालवा रीजन की 69 सीटों पर डेरे का सीधा प्रभाव है।

डेरा मुखी को मिली फरलो का पांच राज्यों के चुनाव पर सीधा असर पड़ेगा। इसका मतलब है कि डेरा प्रेमियों के वोट बैंक को साधने के लिए भाजपा ने यह बड़ा दांव खेला है। वहीं फरलो की खबर के बाद से डेरा प्रेमी भी उत्साहित हैं।

क्या इससे BJP या कांग्रेस को होगा लाभ :
पंजाब में साल 2007, 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में डेरा सिरसा की दखल रही है। इसके अलावा साल 2014 के लोकसभा और अक्तूबर 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी डेरे की पॉलिटिकल विंग ने खुलकर भाजपा का समर्थन किया था। खुद डेरा प्रमुख ने 2014 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी के स्वच्छ भारत मिशन की सराहना कर समर्थन दिया। पंजाब-हरियाणा समेत केंद्र के तमाम बड़े नेता, विधायक, मंत्री डेरा सच्चा सौदा में वोटों के लिए आते रहे हैं।
वर्ष 2006-07 में डेरा सच्चा सौदा ने राजनीतिक विंग का गठन किया था। हर राज्य की अलग विंग बनाई गई। इसमें डेरा प्रमुख के भरोसेमंद लोगों को शामिल किया। 2007 के पंजाब चुनाव में पहली बार प्रत्यक्ष रूप से डेरे की राजनीतिक विंग ने कांग्रेस को समर्थन दिया। कांग्रेस को समर्थन देने के बावजूद 2007 में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा की सरकार बनी। इसके बाद ही डेरा और शिरोमणि अकाली दल के बीच मतभेद बढ़े। पंजाब के बठिंडा में डेरा प्रमुख पर गुरु गोबिंद सिंह के समान कलगी लगाने और अमृत छकाने का आरोप लगा। इसके विरोध में देशभर में सिखों ने प्रदर्शन किए। डेरा प्रमुख पर केस भी दर्ज हुआ। 2012 के चुनाव में मालवा रीजन में शिरोमणि अकाली दल को 33 सीटें मिलीं। 2012 में भी डेरा ने कांग्रेस को समर्थन दिया। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में डेरे ने कुछ सीटों पर अकाली दल को तो कुछ सीटों पर कांग्रेस को समर्थन दिया।
पत्रकार छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति का कहना है कि वोटों के कारण सरकार ने गुपचुप तरीके से राम रहीम को फरलो दी है। पंजाब सहित पांच राज्यों में चुनाव है। इसलिए सरकार ने डेरा प्रमुख को पैरोल दी है। वे इस फैसले को कोर्ट में चुनौती देंगे। उन्होंने लोगों से अपील की कि आगामी चुनावों में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी करने वाले और उनसे वोट मांगने वालों को सबक सिखाएं।

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