Regards on the death anniversary of Chhatrapati Shivaji

छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यतिथि पर सादर नमन ,जानिए क्यों कहा जाता था उनको “father of the indian navy”

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शिवाजी महाराज (पंजाब 365 न्यूज़ ) : हिन्दू सम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यतिथि पर आज देश उनको शत शत नमन कर रहा है। आज छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यतिथि है। छत्रपति शिवाजी महाराज भारत के मराठा सम्राज्य के संस्थापक थे।
कब हुआ जन्म :
शिवाजी महाराज का जन्म 19-फरवरी 1630,में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। शिवाजी के पिता शाहजी और माता जीजाबाई थी। शिवाजी ने अनेक किलों का निर्माण और पुनरूद्धार करवाया था। शिवाजी महाराज का विवाह 14 मई 1640,में सइबाई निम्बालकर के साथ लाल महल पूना में हुआ था। शिवाजी प्रभावशाली कुलीनों के वंशज थे। उस समय भारत पर मुस्लिम शासन था। उत्तरी भारत में मुगलों तथा दक्षिण में बीजापुर और गोलकुंडा में मुस्लिम सुल्तानों का ये तीनों ही अपनी शक्ति के ज़ोर पर शासन करते थे। शिवाजी की पैतृक जायदात बीजापुर के सुलतान द्वारा शासित दक्कन में थी।
मुसलमानों द्वारा किये जा रहे दमन और धार्मिक उत्पीड़न को इतना असहनीय पाया की 16,वर्ष की आयु तक पहुंचते -पहुंचते उन्हें विश्वास हो गया की हिन्दुओं की मुक्ति के लिए ईश्वर ने उन्हें नियुक्त किया है। उनका यही विश्वास जिंदगी भर उनका मार्गदर्शन करता रहा।
शिवाजी ने अच्छी तरह से संरचित प्रशासनिक संगठनों के साथ एक सक्षम और प्रगतिशील नागरिक शासन की स्थापना की। उन्होंने प्राचीन हिंदू राजनीतिक परंपराओं और अदालती सम्मेलनों को पुनर्जीवित किया और मराठी भाषा के उपयोग को बढ़ावा दिया।
शिवाजी की विरासत को पर्यवेक्षक और समय के अनुसार अलग-अलग करना था, लेकिन उनकी मृत्यु के लगभग दो शताब्दियों बाद, उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उद्भव के साथ अधिक महत्व लेना शुरू कर दिया, क्योंकि कई भारतीय राष्ट्रवादियों ने उन्हें एक राष्ट्रवादी और हिंदुओं के नायक के रूप में ऊंचा किया।
शिवाजी अपनी माता जीजाबाई के प्रति समर्पित थे, जो गहरी धार्मिक थीं। हिंदू महाकाव्यों, रामायण और महाभारत के उनके अध्ययन ने उनके हिंदू मूल्यों की आजीवन रक्षा को भी प्रभावित किया। उनकी धार्मिक शिक्षाओं में गहरी रुचि थी, और उन्होंने नियमित रूप से हिंदू संतों की कंपनी की तलाश की। इस बीच, शाहजी ने मोहित परिवार से दूसरी पत्नी तुका बाई से शादी कर ली थी। मुगलों के साथ शांति बनाए रखने के बाद, उन्होंने छह किलों को ढहाते हुए, वह बीजापुर की सल्तनत की सेवा करने के लिए चले गए। उन्होंने शिवाजी और जीजाबाई को शिवनेरी से पुणे स्थानांतरित कर दिया और उन्हें अपने जागीर प्रशासक, दादोजी कोंडदेव की देखभाल में छोड़ दिया, जिन्हें युवा शिवाजी की शिक्षा और प्रशिक्षण की देखरेख करने का श्रेय दिया गया है।
1666 में, औरंगजेब ने शिवाजी को अपने नौ वर्षीय पुत्र संभाजी के साथ आगरा बुलाया। औरंगजेब की योजना अफगानिस्तान में अब कांधार से शिवाजी को भेजने की थी, ताकि मुगल साम्राज्य के उत्तर-पश्चिमी सीमा को मजबूत किया जा सके। हालाँकि, अदालत में, 12 मई 1666 को औरंगजेब ने शिवाजी को अपने दरबार के मनसबदारों (सैन्य कमांडरों) के पीछे खड़ा कर दिया। शिवाजी ने अपराध किया और अदालत से बाहर निकल गए, और उन्हें तुरंत आगरा के कोतवाल फौलाद खान की निगरानी में नजरबंद कर दिया गया।
घर की गिरफ्तारी के तहत शिवाजी की स्थिति खतरनाक थी, क्योंकि औरंगजेब की अदालत ने बहस की कि क्या उसे मारना है या उसे रोजगार देना जारी रखना है, और शिवाजी ने अपने घटते धन का इस्तेमाल दरबारियों को रिश्वत देने के लिए किया। काबुल में सम्राट से शिवाजी को लेने के लिए आदेश आए, जिसे शिवाजी ने मना कर दिया। इसके बजाय उन्होंने अपने किलों को वापस करने और मुगलों की एक मनसबदार के रूप में सेवा करने के लिए कहा; औरंगजेब ने प्रतिवाद किया कि मुगल सेवा में लौटने से पहले उसे अपने बचे हुए किलों को आत्मसमर्पण करना होगा। शिवाजी आगरा से भागने में सफल रहे, संभवतः गार्डों को रिश्वत देकर, हालांकि सम्राट यह पता लगाने में कभी सक्षम नहीं थे कि वे एक जांच के बावजूद कैसे बच गए।
मराठी एवं संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाया। वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम में नायक के रूप में स्मरण किए जाने लगे। बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रीयता की भावना के विकास के लिए शिवाजी जन्मोत्सव की शुरुआत की।
उस समय बीजापुर आपसी संघर्ष तथा मुग़लों के आक्रमण से परेशान था। बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने बहुत से दुर्गों से अपनी सेना हटाकर उन्हें स्थानीय शासकों या सामन्तों के हाथ सौंप दिया था। जब आदिलशाह बीमार पड़ा तो बीजापुर में अराजकता फैल गई और शिवाजी महाराज ने अवसर का लाभ उठाकर बीजापुर में प्रवेश का निर्णय लिया। शिवाजी महाराज ने इसके बाद के दिनों में बीजापुर के दुर्गों पर अधिकार करने की नीति अपनाई। सबसे पहला दुर्ग था रोहिदेश्वर का दुर्ग।

शाहजी की बन्दी और युद्धविराम :

बीजापुर का सुल्तान शिवाजी महाराज की हरकतों से पहले ही आक्रोश में था। उसने शिवाजी महाराज के पिता को बन्दी बनाने का आदेश दे दिया। शाहजी राजे उस समय कर्नाटक में थे और एक विश्वासघाती सहायक बाजी घोरपड़े द्वारा बन्दी बनाकर बीजापुर लाए गए। उन पर यह भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने कुतुबशाह की सेवा प्राप्त करने की कोशिश की थी जो गोलकुंडा का शासक था और इस कारण आदिलशाह का शत्रु। बीजापुर के दो सरदारों की मध्यस्थता के बाद शाहाजी महाराज को इस शर्त पर मुक्त किया गया कि वे शिवाजी महाराज पर लगाम कसेंगे। अगले चार वर्षों तक शिवाजी महाराज ने बीजीपुर के ख़िलाफ कोई आक्रमण नहीं किया। इस दौरान उन्होंने अपनी सेना संगठित की।

मुगलों से पहली मुठभेड़ :

शिवाजी के बीजापुर तथा मुगल दोनों शत्रु थे। उस समय शहज़ादा औरंगजेब दक्कन का सूबेदार था। इसी समय 1 नवम्बर 1656 को बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह की मृत्यु हो गई जिसके बाद बीजापुर में अराजकता का माहौल पैदा हो गया। इस स्थिति का लाभ उठाकर औरंगज़ेब ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया और शिवाजी ने औरंगजेब का साथ देने की बजाय उसपर धावा बोल दिया। उनकी सेना ने जुन्नार नगर पर आक्रमण कर ढेर सारी सम्पत्ति के साथ 200 घोड़े लूट लिये। अहमदनगर से 700 घोड़े, चार हाथी के अलावा उन्होंने गुण्डा तथा रेसिन के दुर्ग पर भी लूटपाट मचाई। इसके परिणामस्वरूप औरंगजेब शिवाजी से खफ़ा हो गया और मैत्री वार्ता समाप्त हो गई। शाहजहां के आदेश पर औरंगजेब ने बीजापुर के साथ सन्धि कर ली और इसी समय शाहजहां बीमार पड़ गया। उसके व्याधिग्रस्त होते ही औरंगज़ेब उत्तर भारत चला गया और वहां शाहजहां को कैद करने के बाद मुगल साम्राज्य का शाह बन गया।

कोंकण पर अधिकार :

दक्षिण भारत में औरंगजेब की अनुपस्थिति और बीजापुर की डवाँडोल राजनीतिक स्थित को जानकर शिवाजी ने समरजी को जंजीरा पर आक्रमण करने को कहा। पर जंजीरा के सिद्दियों के साथ उनकी लड़ाई कई दिनों तक चली। इसके बाद शिवाजी ने खुद जंजीरा पर आक्रमण किया और दक्षिण कोंकण पर अधिकार कर लिया और दमन के पुर्तगालियों से वार्षिक कर एकत्र किया। कल्याण तथा भिवण्डी पर अधिकार करने के बाद वहां नौसैनिक अड्डा बना लिया। इस समय तक शिवाजी 40 दुर्गों के मालिक बन चुके थे।

आगरा में आमंत्रण और पलायन :

शिवाजी को आगरा बुलाया गया जहाँ उन्हें लगा कि उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल रहा है। इसके विरोध में उन्होंने अपना रोश भरे दरबार में दिखाया और औरंगजेब पर विश्वासघात का आरोप लगाया। औरंगजेब इससे क्षुब्ध हुआ और उसने शिवाजी को नजरबन्द कर दिया और उनपर 5000 सैनिकों के पहरे लगा दिये। कुछ ही दिनों बाद (18 अगस्त 1666 को) राजा शिवाजी को मार डालने का इरादा औरंगजेब का था। लेकिन अपने अदम्य साहस ओर युक्ति के साथ शिवाजी और सम्भाजी दोनों इससे भागने में सफल रहे[17 अगस्त 1666। सम्भाजी को मथुरा में एक विश्वासी ब्राह्मण के यहाँ छोड़ शिवाजी महाराज बनारस, गये, पुरी होते हुए सकुशल राजगढ़ पहुँच गए [2 सितम्बर 1666]। इससे मराठों को नवजीवन सा मिल गया। औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उसकी हत्या विष देकर करवा डाली। जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद सन् 1668 में शिवाजी ने मुगलों के साथ दूसरी बार सन्धि की। औरंगजेब ने शिवाजी को राजा की मान्यता दी। शिवाजी के पुत्र शम्भाजी को 5000 की मनसबदारी मिली और शिवाजी को पूना, चाकन और सूपा का जिला लौटा दिया गया। पर, सिंहगढ़ और पुरन्दर पर मुग़लों का अधिपत्य बना रहा। सन् 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लूटा। नगर से 132 लाख की सम्पत्ति शिवाजी के हाथ लगी और लौटते वक्त उन्होंने मुगल सेना को सूरत के पास फिर से हराया।

दक्षिण में विजय :

सन् 1677-78 में शिवाजी का ध्यान कर्नाटक की ओर गया। बम्बई के दक्षिण में कोंकण, तुंगभद्रा नदी के पश्चिम में बेळगांव तथा धारवाड़ का क्षेत्र, मैसूर, वैलारी, त्रिचूर तथा जिंजी पर अधिकार करने के बाद ३ अप्रैल, 1680 को शिवाजी का देहान्त हो गया।

मृत्यु और उत्तराधिकार :

छत्रपती शिवाजी महाराज की मृत्यु 3 अप्रैल 1680 में हुई। उस समय शिवाजी के उत्तराधिकार संभाजी को मिले। शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र संभाजी थे और दूसरी पत्नी से राजाराम नाम एक दूसरा पुत्र था। उस समय राजाराम की उम्र मात्र 10 वर्ष थी अतः मराठों ने शम्भाजी को राजा मान लिया। उस समय औरंगजेब राजा शिवाजी का देहान्त देखकर अपनी पूरे भारत पर राज्य करने कि अभिलाषा से अपनी 5,00,000 सेना सागर लेकर दक्षिण भारत जीतने निकला। औरंगजेब ने दक्षिण में आते ही अदिल्शाही २ दिनो में और कुतुबशाही १ ही दिनो में खतम कर दी। पर राजा सम्भाजी के नेतृत्व में मराठाओ ने ९ साल युद्ध करते हुये अपनी स्वतन्त्रता बरकरा‍र रखी। औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर ने औरंगजेब के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया। संभाजी ने उसको अपने यहाँ शरण दी। औरंगजेब ने अब फिर जोरदार तरीके से संभाजी के ख़िलाफ़ आक्रमण करना शुरु किया। उसने अन्ततः 1689 में संभाजी के बीवी के सगे भाई याने गणोजी शिर्के की मुखबरी से संभाजी को मुकरव खाँ द्वारा बन्दी बना लिया। औरंगजेब ने राजा संभाजी से बदसलूकी की और बुरा हाल कर के मार दिया। अपनी राजा कि औरंगजेब द्वारा की गई बदसलूूूकी और नृशंसता द्वारा मारा हुआ देखकर पूरा मराठा स्वराज्य क्रोधित हुआ। उन्होने अपनी पुरी ताकत से राजाराम के नेतृत्व में मुगलों से संघर्ष जारी रखा। 1700 इस्वी में राजाराम की मृत्यु हो गई। उसके बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई 4 वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय की संरक्षिका बनकर राज करती रही। आखिरकार 25 साल मराठा स्वराज्य के युद्ध लड के थके हुये औरंगजेब की उसी छ्त्रपती शिवाजी के स्वराज्य में दफन हुये।

भारत में वीर छत्रपति शिवाजी महाराज को “father-of -indian-navy” भी कहा जाता है। 1674-में शिवाजी महाराज ने “नेवी फाॅर्स ” की स्थापना की थी। ताकि अरब, पुर्तगाली ,ब्रिटिश और समुंद्री लुटेरों से कोंकण और गोवा के समुंद्री इलाकों की रक्षा की जा सके। उस समय शिवाजी महाराज के पास 800- जहाज़ थे।


शिवाजी महाराज के वचन :
सर्वप्रथम राष्ट्र ,फिर गुरु
फिर माता पिता फिर
परमेश्वर
अत:
पहले खुद को नहीं राष्ट्र को देखना चाहिए “

प्रमुख तिथियां और घटनाएं

1630/2/19 : शिवाजी महाराज का जन्म।
14 मई 1640 : शिवाजी महाराज और साईबाई का विवाह
1646 : शिवाजी महाराज ने पुणे के पास तोरण दुर्ग पर अधिकार कर लिया।
1656 : शिवाजी महाराज ने चन्द्रराव मोरे से जावली जीता।
10 नवंबर, 1659 : शिवाजी महाराज ने अफजल खान का वध किया।
5 सितंबर, 1659 : संभाजी का जन्म।
1659 : शिवाजी महाराज ने बीजापुर पर अधिकार कर लिया।
6 से 10 जनवरी, 1664 : शिवाजी महाराज ने सूरत पर धावा बोला और बहुत सारी धन-सम्पत्ति प्राप्त की।
1665 : शिवाजी महाराज ने औरंगजेब के साथ पुरन्धर शांति सन्धि पर हस्ताक्षर किया।
1666 : शिवाजी महाराज आगरा कारावास से भाग निकले।
1667 : औरंगजेब राजा शिवाजी महाराज के शीर्षक अनुदान। उन्होंने कहा कि कर लगाने का अधिकार प्राप्त है।
1668 : शिवाजी महाराज और औरंगजेब के बीच शांति सन्धि
1670 : शिवाजी महाराज ने दूसरी बार सूरत पर धावा बोला।
1674 : शिवाजी महाराज ने रायगढ़ में ‘छत्रपति’की पदवी मिली और राज्याभिषेक करवाया । 18 जून को जीजाबाई की मृत्यु।
1680 : शिवाजी महाराज की मृत्यु।

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