National Girl Child Day

राष्ट्रीय बालिका दिवस : अगर बेटा है वारिस तो बेटी है पारस

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राष्ट्रिय बालिका दिवस ( पंजाब 365 न्यूज़ ) : राष्ट्रीय बालिका दिवस भारत में हर साल 24 जनवरी को मनाया जाता है। भले ही हमारा देश तरक्कीयों की और दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है लेकिन अभी भी कई देश के हिस्सों में बेटियों के साथ अच्छा बर्ताब नहीं किया जाता है।
आज बालिका हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है लेकिन आज भी वह अनेक कुरीतियों का शिकार हैं। ये कुरीतियों उसके आगे बढ़ने में बाधाएँ उत्पन्न करती है। पढ़े-लिखे लोग और जागरूक समाज भी इस समस्या से अछूता नहीं है। आज हज़ारों लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है या जन्म लेते ही लावारिस छोड़ दिया जाता है। आज भी समाज में कई घर ऐसे हैं, जहाँ बेटियों को बेटों की तरह अच्छा खाना और अच्छी शिक्षा नहीं दी जा रही है। भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5 प्रतिशत (क़रीब आधी) औरतें ऐसी हैं, जिनकी शादियाँ 18 साल के पहले हुईं हैं। इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22 प्रतिशत (क़रीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं, जो 18 साल के पहले माँ बनी हैं। इन कम उम्र की लड़कियों से 73 प्रतिशत (सबसे ज़्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं। इन बच्चों में 67 प्रतिशत (दो-तिहाई) कुपोषण के शिकार हैं। राष्ट्रीय बालिका दिवस के दिन हमें लड़का-लड़की में भेद नहीं करने व समाज के लोगों को लिंग समानता के बारे में जागरूक करने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। देश में लड़कियों की घटती संख्या को देखते हुए ही राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाने लगा है। आज लड़कियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, फिर चाहे बात खेल की हो या फिर नौकरी की। उनके भीतर कुछ कर गुजरने की भूख दिन ब दिन तेज हो रही। सरकार ने उनकी हौसलाअफजाई के लिए कई कार्यक्रम चला रखा है। लेकिन इसके उपरान्त आज भी वह अनेक कुरीतियों की शिकार हैं। ये कुरीतियां उसके आगे बढ़ने में बाधाएं उत्पन्न करती हैं। पढ़े-लिखे लोग और जागरूक समाज भी इस समस्या से अछूता नहीं है।
हमे बेटियों को कर कदम पर करना चाहिए प्रोत्साहित :
बालिकाओं की सेहत, पोषण व पढ़ाई जैसी चीज़ों पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है ताकि बड़ी होकर वे शारीरिक, आर्थिक, मानसिक व भावनात्मक रूप से आत्मनिर्भर व सक्षम बन सकें। बालिकाओं को घरेलू हिंसा, बाल विवाह व दहेज जैसी चीज़ों के बारे में सचेत करना चाहिए। उन्हें अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक बनाया जाना चाहिए। किशोरियों व बालिकाओं के कल्याण के लिए सरकार ने ‘समग्र बाल विकास सेवा’, ‘धनलक्ष्मी’ जैसी योजनाएँ चलाई हैं। हाल ही में लागू हुई ‘सबला योजना’ किशोरियों के सशक्तीकरण के लिए समर्पित है। इन सबका उद्देश्य लड़कियों, ख़ासकर किशोरियों को सशक्त बनाना है ताकि वे आगे चलकर एक बेहतर समाज के निर्माण में योगदान दे सकें।
महिला एवं बाल विकास,की शुरुआत भारत सरकार ने 2008 में की थी। इस दिन को विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिसमें सेव द गर्ल चाइल्ड, चाइल्ड सेक्स रेशियो, और बालिकाओ के लिए स्वास्थ्य और सुरक्षित वातावरण बनाने सहित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करना शामिल है।24 जनवरी के दिन पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को नारी शक्ति के रूप में याद किया जाता है। इस दिन इंदिरा गांधी पहली बार प्रधानमंत्री के रूप में कर्यभाल संभाला था। इसलिए इस दिन को राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाया जाता है। 2019 में, इसे ‘एम्पॉवरिंग गर्ल्स फॉर ए ब्राइटर टुमॉरो’ की थीम के साथ मनाया गया।
उद्देश्य :
1.देश में लड़कियों द्वारा सामना की जाने वाली सभी असमानताओं के बारे में लोगों में जागरूकता फैलाना।
2.बालिकाओं के अधिकारों के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देना।
3. बालिका शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के महत्व पर जागरूकता बढ़ाना।

अकसर हमने देखा है की जिन घरों में लड़कियां पैदा होती है बड़े होने पर उनको घर के काम काज पर ज्यादा ध्यान देने के लिए कहा जाता है लेकिन आज की नारी किसी भी तरीके से पुरुष से कम नहीं है। लड़कियों के आगे न बढ़ने के कारण यह भी है कि अक्सर घरों में कहा जाता है कि अगर लड़की है, तो उन्हें घर संभालने और अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने की अधिक ज़रूरत है। इस प्रकार की बातें उसके सुधार की राह में बाधाएँ बनती हैं। इन्हीं सब स्थितियों और भेदभावों को मिटाने के मक़सद से ‘बालिका दिवस’ मनाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। इसे बालिकाओं की अपनी पहचान न उभर पाने के पीछे छिपे असली कारणों को सामने लाने के रूप में मनाने की जरुरत है, जो सामाजिक धारणा को समझने के साथ-साथ बालिकाओं को बहन, बेटी, पत्नी या माँ के दायरों से बाहर निकालने और उन्हें सामाजिक भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करने में मदद के तौर पर जाना जाए।
बालिका शिशु की भूमिका व महत्व के प्रति सभी को जागरूक करना है.
बेटियां है अनमोल :
– देश में बाल लिंगानुपात को दूर करने के लिए काम करना है.

– कोशिश यह रहनी चाहिए कि हर बेटी को समाज में उचित मान-सम्मान मिलें.

– लड़कियों को उनका अधिकार प्राप्त हो.

– बालिका के पालन-पोषण, सेहत, पढ़ाई, अधिकार पर विचार-विमर्श करना और उल्लेखनीय क़दम उठाना.

  • स दिन देशभर में बालिकाओं को लेकर बने क़ानून के बारे में सभी को बताया जाता है.
  • बाल-विवाह, घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना आदि को लेकर विचार किया जाता है और सार्थक पहल करने पर निर्णय लिया जाता है.
  • आज ही के दिन बालिका शिशु बचाओ के संदेश द्वारा अख़बारों, रेडियो, टीवी आदि जगहों पर सरकार, एनजीओ, गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा प्रचार-प्रसार किया जाता है.
  • पिता और पुत्री में एक बात आम होती है कि दोनों ही अपनी गुड़िया को बहुत प्यार करते हैं…
  • खिलती हुई कलियां हैं बेटियां, मां-बाप का दर्द समझती हैं बेटियां

घर को रोशन करती हैं बेटियां, लड़के आज हैं, तो आनेवाला कल है बेटियां…
हमने कई बार देखा है हमारे समाज में कई मौकों पर कन्या पूजन होता है। लेकिन बेटी पैदा होने पर कई लोगों का मुंह उतर जाता है। वहीं, बेटे के जन्म पर ‘सोहर’ और जश्न होता है। यह स्थिति देश के करीब-करीब सभी हिस्सों में है। हरियाणा और राजस्थान के हालात तो वहां के लिंगानुपात ही बयान कर देते हैं। लड़कियों को समाज में तरह की कुरीतियां हैं। सरकार राष्ट्रीय बालिका दिवस के माध्यम से उन कुरीतियों को दूर करने की कोशिश कर रही है।

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