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Breaking news : क्या बिक जायेगा दिलीप कुमार और राज कपूर का पैतृक आवास जानने के लिए पढ़े पूरी खबर

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पकिस्तान  (पंजाब 365 न्यूज़)  :  पकिस्तान भारतीय फिल्मों के ” शो  मैन ” कहे जाने बाले  राज कपूर और “ट्रेजेडी किंग ” दिलीप कुमार की पुश्तैनी हवेलिओं को संग्रहालय बनाने के लिए इनके मालिकों से खरीददारी के लिए फिर से बातचीत शुरू की गयी है। पकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा की सरकार वहा स्थित मशहूर बॉलीबुड कलाकार दिलीप कुमार और राज कपूर की पैतृक   सम्पति को खरीदने के लिए इस सम्पति के मालीकों से दाम को लेकर बातचीत शुरू कर दी है। वहां की सरकार इसलिए आवास  को खरीदना चाहती है की ताकि वहां की दोनों ऐतहासिक इमारतों को स्मारक में तब्दील किया जा सके।

एक बरिष्ट अधिकारी ने ये  जानकारी साझा की।

खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के मुख्यमंत्री के विशेष सहायक कामरान बशंक ने लाहौर में बातचीत के दौरान कहा की उन्हें पूरा भरोसा है की प्रांतीय सरकार दोनों इमारतों के मालिकों से खरीददारी संबंधित बातचीत जल्द पूरी कर लेगी।  उनका कहना है की इन इमारतों को पहले ही राष्ट्रिय धरोहर घोषित किया जा चूका है।  प्रांतीय सरकार ने इस महीने की शुरुआत में ही दोनों अभिनेताओं की पैतृक सम्पति को खरीदने के लिए 235- करोड़ की राशि मंज़ूर की थी। ये दोनों इमारते शहर के बीचों बीच खडी  है। हालंकि इन इमारतों के मालिकों ने कहा था की इन  इमारतों की कीमत बहुत काम लगाई गयी है। इसलिए माकन मालिकों ने अपनी इस सम्पति को बेचने से मना कर दिया है।

आपको बता दे की ट्रेजेडी किंग को किस्सा ख्वानी बाजार स्थित अपने पुश्तैनी घर को छोड़ हुए आठ दशक से भी लम्बा समय हो गया है।

आपो बता दे की दिलीप कुमार के पैतृक आवास की कीमत 80.56- लाख रूपए  लगाई गयी है जबकि राज कुमार के आवास की कीमत करीब डेड करोड़ तय की गयी थी।     

दिलीप कुमार :

दिलीप कुमार का जन्म 11 दिसम्बर, 1922 को वर्तमान पाकिस्तान के पेशावर शहर में हुआ था। उनके बचपन का नाम ‘मोहम्मद युसूफ़ ख़ान था। उनके पिता का नाम लाला ग़ुलाम सरवर था जो फल बेचकर अपने परिवार का ख़र्च चलाते थे। विभाजन के दौरान उनका परिवार मुंबई आकर बस गया था।

 हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय अभिनेता है जो भारतीय संसद के उच्च सदन राज्य सभा के सदस्य रह चुके है। दिलीप कुमार को उनके दौर का बेहतरीन अभिनेता माना जाता है, त्रासद या दु:खद भूमिकाओं के लिए मशहूर होने के कारण उन्हे ‘ट्रेजिडी किंग’ भी कहा जाता था। उन्हें भारतीय फ़िल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, इसके अलावा दिलीप कुमार को पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ से भी सम्मानित किया गया है।

उनकी  पहली फ़िल्म ‘ज्वार भाटा’ थी, जो 1944 में आई। 1949 में बनी फ़िल्म अंदाज़ की सफलता ने उन्हे प्रसिद्धी दिलाई, इस फ़िल्म में उन्होने राज कपूर के साथ काम किया। दिदार (1951) और देवदास (1955) जैसी फ़िल्मो में दुखद भूमिकाओं के मशहूर होने के कारण उन्हे ट्रेजिडी किंग कहा गया। मुगले-ए-आज़म (1960) में उन्होने मुग़ल राजकुमार जहांगीर की भूमिका निभाई। यह फ़िल्म पहले श्वेत और श्याम थी और 2004 में रंगीन बनाई गई। उन्होने 1961 में गंगा जमुना फ़िल्म का निर्माण भी किया, जिसमे उनके साथ उनके छोटे भाई नासीर खान ने काम किया।

1970, 1980 और 1990 के दशक में उन्होने कम फ़िल्मो में काम किया। इस समय की उनकी प्रमुख फ़िल्मे थी :

विधाता (1982), दुनिया (1984), कर्मा (1986), इज्जतदार (1990) और सौदागर (1991)। 1998 में बनी फ़िल्म किला उनकी आखरी फ़िल्म थी।

उन्होने रमेश सिप्पी की फ़िल्म शक्ति में अमिताभ बच्चन के साथ काम किया। इस फ़िल्म के लिए उन्हे फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला।

वे आज भी प्रमुख अभिनेताओ जैसे शाहरूख खा़न के प्रेरणास्रोत्र है।

राज कपूर :

राज कपूर जन्म सृष्टि नाथ कपूर; 14 दिसंबर 1924- को हुआ जबकि मृत्यु  – 2 जून 1988) को हुई। राज कपूर जी  एक भारतीय फिल्म अभिनेता, निर्माता और भारतीय सिनेमा के निर्देशक थे। उन्हें व्यापक रूप से भारतीय सिनेमा और मनोरंजन के इतिहास में सबसे बड़ा शोमैन माना जाता है।

राज कपूर  हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता, निर्माता एवं निर्देशक थे। नेहरूवादी समाजवाद से प्रेरित अपनी शुरूआती फ़िल्मों से लेकर प्रेम कहानियों को मादक अंदाज से परदे पर पेश करके उन्होंने हिंदी फ़िल्मों के लिए जो रास्ता तय किया, इस पर उनके बाद कई फ़िल्मकार चले। भारत में अपने समय के सबसे बड़े ‘शोमैन’ थे।

सन् 1935 में मात्र 11 वर्ष की उम्र में राजकपूर ने फ़िल्म ‘इंकलाब’ में अभिनय किया था। उस समय वे बॉम्बे टॉकीज़ स्टुडिओ में सहायक (helper) का काम करते थे। बाद में वे केदार शर्मा के साथ क्लैपर ब्वाय का कार्य करने लगे। कुछ लोगों का मानना है कि उनके पिता पृथ्वीराज कपूर को विश्वास नहीं था कि राज कपूर कुछ विशेष कार्य कर पायेगा, इसीलिये उन्होंने उसे सहायक या क्लैपर ब्वाॅय जैसे छोटे काम में लगवा दिया था।  परन्तु, पृथ्वीराज कपूर के साथ रहने वाले एवं बाद के दिनों में राज कपूर के निजी सहायक एवं सहयोगी निर्देशक वीरेन्द्रनाथ त्रिपाठी का कहना है : “पापा जी (पृथ्वीराज) हमेशा कहते थे राज पढ़ेगा-लिखेगा नहीं, पर फिल्मी दुनिया में शानदार काम करेगा। आज केदार ने उसे मेरा बेटा होने के कारण काम दिया है, लेकिन एक दिन वह भी होगा जब लोग राज को पृथ्वीराज का बेटा नहीं बल्कि पृथ्वीराज को राज कपूर का बाप होने के कारण जानेंगे।”  उस समय के प्रसिद्ध निर्देशक केदार शर्मा ने राज कपूर के भीतर के अभिनय क्षमता और लगन को पहचाना और उन्होंने राज कपूर को सन् 1947 में अपनी फ़िल्म ‘नीलकमल’ में नायक  की भूमिका दे दी।

सन् 1959 में राज कपूर अभिनीत पाँच फिल्में प्रदर्शित हुईं– ‘अनाड़ी’, ‘दो उस्ताद’, ‘कन्हैया’, ‘मैं नशे में हूँ’, तथा ‘चार दिल चार राहें’। इनमें से किसी के निर्माता-निर्देशक स्वयं राज कपूर नहीं थे। इनमें से ख्वाजा अहमद अब्बास निर्देशित ‘चार दिल चार राहें’ असफल हो गयी तथा ‘अनाड़ी’ को छोड़कर शेष तीन फिल्में औसत रूप में ही सफल रहीं। ‘अनाड़ी’ का निर्माण एल॰बी॰ लछमन तथा निर्देशन सुप्रसिद्ध निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने किया था। यह फिल्म राज कपूर के लिए एक सुखद घटना बन गयी। 1956 में नरगिस के अलग हो जाने के बाद 1959 में आकर ‘अनाड़ी’ ने राज कपूर को फिर अनोखे रूप में प्रस्तुत किया। निराशा का एक दौर समाप्त हुआ और सृजनात्मकता का नया अध्याय आरंभ। इसमें उत्कृष्ट अभिनय के लिए राज कपूर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ‘फिल्मफेयर पुरस्कार’ भी प्राप्त हुआ। 

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